Friday, July 16, 2010

सोचने का यन्त्र

दिल और दिमाग दोनों एक ही शारीर के अलग-अलग भाग हैं। दिल और दिमाग दोनों के काम अलग - अलग हैं। ऐसा मना जाता है की लोग दिल और दिमाग दोनों से सोचतें हैं। बिज्ञान के अनुसार सोचने का तंत्र दिमाग है। मगर अभी भी बिज्ञान के पास इसका पक्का और पुख्ता साबुत नहीं है।

अगर माने तो सोचने का स्थान ना तो दिल है और ना ही दिमाग। ये दोनों यन्त्र केवल रिसीवर और ट्रांसमीटर का काम करते हैं। सोचने की प्रकिया बहुत हीं जटिल और अबूझ है।

इन्सान जैसा और जो भी चाहे, सोच नहीं सकता। सोचने वालों के संस्कार और सोचने वाले के पास मौजूद कारकों की वजह से सोच स्वमेब उत्त्पन्न होते है। यह सोच हृदय स्थल में उत्पन्न होता है और मस्तिस्क उसे तंत्रिकाओं के माध्यम से रिसीव करता है, उसका एनेलिसिस करता है और फिर उसे सम्बंधित बिभाग को अगली करवाई के लिए भेज देता है।

इन्सान की सोच में उसकी स्थिति और परिस्थिति का सबसे बड़ा कारक होता है। स्थिति और परिस्थिति के पीछे उसका जनम, लालन-पालन और उसके संस्कार बहुत बड़ा करक होता है। इन्सान का जनम, लालन-पालन और संस्कार उसके बस या उसके हाथ में नहीं होता। जो चीज उसके बस में या उसके हाथ में नहीं है, उससे उत्त्पन्न होने वाला सोच कैसे उसके बस या उसके हाथ में हो सकता है?

Thursday, July 15, 2010

सच का सामना

सच का सामना वही कर सकता है, जिसने सच को जाना और पहचाना है। सच को जानना और उसे पहचानना सरल भी नहीं है। वर्षों की साधना और तपश्या के बाद सच की एक झलक मिलती है।
सच वह नहीं है जिसे सभी सच समझते है। सच वो है जिसे कोई समझ नहीं सकता। हमारी शारीरिक और मानसिक छमता सिमित है। हमारा मस्तिस्क सच को जानने और समझने के योग्य नहीं है।
सच को जानने के लिए भौतिक जगत से बहार जाना होता है। इसके लिए लम्बी और अथक साधना की जरुरत पड़ती है। इन्सबो के बाद भी यह आवश्यक नहीं की सच से सामना हो ही जाये।
सच का उदभव हमेशा ही आपने अलग स्वरुप में ही होता है, जिसे केवल महशुस किया जा सकता है। जब सच का उदय मानव शारीर में होता है तो इसका सामना करना इतना आसान भी नहीं होता। सच के आगे कमजोर मानव पागल भी हो सकता है.