दिल और दिमाग दोनों एक ही शारीर के अलग-अलग भाग हैं। दिल और दिमाग दोनों के काम अलग - अलग हैं। ऐसा मना जाता है की लोग दिल और दिमाग दोनों से सोचतें हैं। बिज्ञान के अनुसार सोचने का तंत्र दिमाग है। मगर अभी भी बिज्ञान के पास इसका पक्का और पुख्ता साबुत नहीं है।
अगर माने तो सोचने का स्थान ना तो दिल है और ना ही दिमाग। ये दोनों यन्त्र केवल रिसीवर और ट्रांसमीटर का काम करते हैं। सोचने की प्रकिया बहुत हीं जटिल और अबूझ है।
इन्सान जैसा और जो भी चाहे, सोच नहीं सकता। सोचने वालों के संस्कार और सोचने वाले के पास मौजूद कारकों की वजह से सोच स्वमेब उत्त्पन्न होते है। यह सोच हृदय स्थल में उत्पन्न होता है और मस्तिस्क उसे तंत्रिकाओं के माध्यम से रिसीव करता है, उसका एनेलिसिस करता है और फिर उसे सम्बंधित बिभाग को अगली करवाई के लिए भेज देता है।
इन्सान की सोच में उसकी स्थिति और परिस्थिति का सबसे बड़ा कारक होता है। स्थिति और परिस्थिति के पीछे उसका जनम, लालन-पालन और उसके संस्कार बहुत बड़ा करक होता है। इन्सान का जनम, लालन-पालन और संस्कार उसके बस या उसके हाथ में नहीं होता। जो चीज उसके बस में या उसके हाथ में नहीं है, उससे उत्त्पन्न होने वाला सोच कैसे उसके बस या उसके हाथ में हो सकता है?
