सच का सामना वही कर सकता है, जिसने सच को जाना और पहचाना है। सच को जानना और उसे पहचानना सरल भी नहीं है। वर्षों की साधना और तपश्या के बाद सच की एक झलक मिलती है।
सच वह नहीं है जिसे सभी सच समझते है। सच वो है जिसे कोई समझ नहीं सकता। हमारी शारीरिक और मानसिक छमता सिमित है। हमारा मस्तिस्क सच को जानने और समझने के योग्य नहीं है।
सच को जानने के लिए भौतिक जगत से बहार जाना होता है। इसके लिए लम्बी और अथक साधना की जरुरत पड़ती है। इन्सबो के बाद भी यह आवश्यक नहीं की सच से सामना हो ही जाये।
सच का उदभव हमेशा ही आपने अलग स्वरुप में ही होता है, जिसे केवल महशुस किया जा सकता है। जब सच का उदय मानव शारीर में होता है तो इसका सामना करना इतना आसान भी नहीं होता। सच के आगे कमजोर मानव पागल भी हो सकता है.

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