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Monday, May 24, 2010

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इस धरती पर बड़े बड़े विचारक पैदा लिए। सबों ने अपनी-अपनी सोच के अनुसार दुनिया के सामने विचार रखे। दुनिया ने उन विचारों पर फिर से सोचा और उसे सही या गलत बताया। विचारों पर सोच समझ कर आलोचनाएँ और समालोचनाए हुई। मगर हल कुछ भी नहीं निकला।


युग पुरुष महात्मा गाँधी के विचार, लेनिन और डार्विन के विचार, मार्क्स के सभी के विचार सम कालीन थे। समय के साथ सबों के विचार धुंधले पड़ते गए। कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी आज भी प्रासंगिक हैं। मगर आज ना कोई गाँधी के विचारों को मनने के लिए तैयार है और कुछ लोग तो उनके विचारों के सकत विरोधी भी हैं।

हर विचार के दो पहलू होते हैं। एक पछ तो दूसरा विपछ। पछ सकारात्मक होता है तो विपछ नकारात्मक। लेकिन दोनों पछों का महत्व हमेशा सामान ही होता है। दोनों एक हीं सिक्के के दो पहलू होते हैं। हमेशा साथ साथ चलते है।

कोई भी ऐसा विचार नहीं हो सकता जिसका कि सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू ना हो। जबतक दोनों पहलू विद्यमान है तब तक विचार कभी भी सत्य अथवा अथार्थ नहीं हो सकता। विचार को सत्य और अथार्थ होने के लिए, इन दोनों पहलुओं में से किसी भी का नहीं होना आवश्यक है।