Friday, May 21, 2010

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हम समझते हैं कि हमारी सोच और समझ हमारे आपने दिमाग कि उपज है। जबकि सच ऐसा नहीं है। हमारी सोच और समझ हमारे दिमाग कि नहीं हमारे पिछले कर्मों और अनुभवों का संचित डाटा और उसके बिशलेषण से उपजी आउट पुट का  एफ्फेक्ट मात्र है।
हमारी सोच परिस्थितियों और इच्छाओं के अनुसार बदलती रहती है। हमारी सोच हमारे पिछले कर्मो और अनुभवों के अनुसार अपना रूप और अपना आकर लेती रहती है। आज   हम जो कुछ भी हैं, आपने पिछले कर्मों के परिणाम मात्र हैं। एक कर्म कई नए कर्मो को जन्म देती है। यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है।
असल में हम सोचते नहीं, वल्कि हम सोचने को मजबूर होते है। पिछले कर्मों कि वजह से आगे जो नए कर्मों कि श्रंखला उत्पन्न होती है, हमारी सोच उसी का परिणाम है।
इसलिए सोचना बंद करें फिर देखें कि आगे क्या होता है ?

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