ऐसा मना जाता है कि सवालों के जबाब सोचने से मिलते हैं। मगर ऐसा नहीं है। सोचने से नए सवाल खड़े होते हैं। मूल सवाल के जबाब नहीं मिलते।
अगर मूल सवालों के जबाब सोचने से मिले होते तो अबतक सारे सवालों के जबाब मिल जाने चाहिए थे।
रोज नीत नए सवाल खड़े हो रहे हैं और इन्सान उनसबों के जबाब खोजने में लगा है। ज्यादा सोचने वाला इन्सान ज्यादा चालक और चतुर हो सकता है, ज्यादा बुद्धिमान नहीं हो सकता।
जिनलोगों ने मूल सवालों के जबाब खोजे है, वे सोचने में विश्वास नहीं रखते थे। वे तो वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजते थे।
वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजे जा सकते हैं, ऐसा आपने कभी सुना है ? अगर सुना है तो हमें भी बताएं। आपका स्वागत है।
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Friday, May 21, 2010
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हमारा जन्म, हमारा लालन-पालन, हमारी प्रार्थमिक शिक्छा, हमारे माता पिता, जीवन कि ये मुलभुत आधार स्तम्भ, हमारी इच्छाओं और हमारी सोच की वजह से हमें नहीं मिले। भौतिक जीवन में इन चीजों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।
क्या वजह है कि कोई गरीब घर में जनम लेता है और कोई शुखी संम्पन्न घर में ? क्या वजह है कि कोई जन्म के साथ ही करोरपति होता है और कोई दूध के लिए भी तरसता है ?जन्म के साथ हमें जो मिलता है जिसे हम विरासत या प्रारब्ध कहते है, वह एक सा क्यों नहीं होता ? इस धरती कि कुदरती चीजे सबों को एक सामान मिलती है, जैसे हवा, प्राणवायु, सूर्य की रोशनी, मिटटी, पानी इत्यादि। परन्तु भौतिक जीवन के ये आधार, हमसाबों को एक जैसे क्यों नहीं मिलते ?
क्या आपके पास इसका जबाब है ? अगर है तो अवश्य लिखे। आपका स्वागत है।
क्या वजह है कि कोई गरीब घर में जनम लेता है और कोई शुखी संम्पन्न घर में ? क्या वजह है कि कोई जन्म के साथ ही करोरपति होता है और कोई दूध के लिए भी तरसता है ?जन्म के साथ हमें जो मिलता है जिसे हम विरासत या प्रारब्ध कहते है, वह एक सा क्यों नहीं होता ? इस धरती कि कुदरती चीजे सबों को एक सामान मिलती है, जैसे हवा, प्राणवायु, सूर्य की रोशनी, मिटटी, पानी इत्यादि। परन्तु भौतिक जीवन के ये आधार, हमसाबों को एक जैसे क्यों नहीं मिलते ?
क्या आपके पास इसका जबाब है ? अगर है तो अवश्य लिखे। आपका स्वागत है।
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हम समझते हैं कि हमारी सोच और समझ हमारे आपने दिमाग कि उपज है। जबकि सच ऐसा नहीं है। हमारी सोच और समझ हमारे दिमाग कि नहीं हमारे पिछले कर्मों और अनुभवों का संचित डाटा और उसके बिशलेषण से उपजी आउट पुट का एफ्फेक्ट मात्र है।
हमारी सोच परिस्थितियों और इच्छाओं के अनुसार बदलती रहती है। हमारी सोच हमारे पिछले कर्मो और अनुभवों के अनुसार अपना रूप और अपना आकर लेती रहती है। आज हम जो कुछ भी हैं, आपने पिछले कर्मों के परिणाम मात्र हैं। एक कर्म कई नए कर्मो को जन्म देती है। यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है।
असल में हम सोचते नहीं, वल्कि हम सोचने को मजबूर होते है। पिछले कर्मों कि वजह से आगे जो नए कर्मों कि श्रंखला उत्पन्न होती है, हमारी सोच उसी का परिणाम है।
इसलिए सोचना बंद करें फिर देखें कि आगे क्या होता है ?
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