Friday, May 21, 2010

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ऐसा मना जाता है कि सवालों के जबाब सोचने से मिलते हैं। मगर ऐसा नहीं है। सोचने से नए सवाल खड़े होते हैं। मूल सवाल के जबाब नहीं मिलते।

अगर मूल सवालों के जबाब सोचने से मिले होते तो अबतक सारे सवालों के जबाब मिल जाने चाहिए थे।

रोज नीत नए सवाल खड़े हो रहे हैं और इन्सान उनसबों के जबाब खोजने में लगा है। ज्यादा सोचने वाला इन्सान ज्यादा चालक और चतुर हो सकता है, ज्यादा बुद्धिमान नहीं हो सकता।

जिनलोगों ने मूल सवालों के जबाब खोजे है, वे सोचने में विश्वास नहीं रखते थे। वे तो वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजते थे।

वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजे जा सकते हैं, ऐसा आपने कभी सुना है ? अगर सुना है तो हमें भी बताएं। आपका स्वागत है।

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