Thursday, September 9, 2010

विचारों की तीब्रता

विचारों की तीब्रता
प्रत्येक विचार अपनी-अपनी तीव्रता के साथ मनुष्य के चीत्त में उत्त्पन्न होते है। विचरों की तीव्रता, उसके उद्भ्व एवं चीत्त की नैश्र्गिक स्थिति के आधार पर निर्धारित होती है। विचारों के उद्भ्व का समय एवं उत्पत्ति के चित्त्मुल कारक उसकी तीव्रता के निर्माण में ऊर्जा प्रदान करतें हैं। विचरों की तीव्रता, इस ब्र्ह्माण्ड में मौजुद सारे नियमकों के चुम्बकीय उर्जा एवं विधुतीय तरंगों के प्रभाव से भी प्रभावित होतें है।प्रत्येक विचार अपने आप में एक उर्जा लिये होता है. प्रत्येक विचार अपने अंदर मौजुद इसी उर्जा की वजह से क्रिया में रुपंतरित होतें हैं. जिस विचार के अंदर जितनी ज्यदा ऊर्जा होती है, वह विचार उतनी हीं तीव्रत्ता के साथ क्रिया में रुपंतरित होता है. विचरों के अंदर मौजुद यह ऊर्जा क्रिया के साथ भी संलग्न हो जातें है. विचारों की तीव्रत्ता से उत्त्पन्न क्रिया के अंदर मौजुद ऊर्जा उसके परिणाम को प्रभावित करती है.

Friday, July 16, 2010

सोचने का यन्त्र

दिल और दिमाग दोनों एक ही शारीर के अलग-अलग भाग हैं। दिल और दिमाग दोनों के काम अलग - अलग हैं। ऐसा मना जाता है की लोग दिल और दिमाग दोनों से सोचतें हैं। बिज्ञान के अनुसार सोचने का तंत्र दिमाग है। मगर अभी भी बिज्ञान के पास इसका पक्का और पुख्ता साबुत नहीं है।

अगर माने तो सोचने का स्थान ना तो दिल है और ना ही दिमाग। ये दोनों यन्त्र केवल रिसीवर और ट्रांसमीटर का काम करते हैं। सोचने की प्रकिया बहुत हीं जटिल और अबूझ है।

इन्सान जैसा और जो भी चाहे, सोच नहीं सकता। सोचने वालों के संस्कार और सोचने वाले के पास मौजूद कारकों की वजह से सोच स्वमेब उत्त्पन्न होते है। यह सोच हृदय स्थल में उत्पन्न होता है और मस्तिस्क उसे तंत्रिकाओं के माध्यम से रिसीव करता है, उसका एनेलिसिस करता है और फिर उसे सम्बंधित बिभाग को अगली करवाई के लिए भेज देता है।

इन्सान की सोच में उसकी स्थिति और परिस्थिति का सबसे बड़ा कारक होता है। स्थिति और परिस्थिति के पीछे उसका जनम, लालन-पालन और उसके संस्कार बहुत बड़ा करक होता है। इन्सान का जनम, लालन-पालन और संस्कार उसके बस या उसके हाथ में नहीं होता। जो चीज उसके बस में या उसके हाथ में नहीं है, उससे उत्त्पन्न होने वाला सोच कैसे उसके बस या उसके हाथ में हो सकता है?

Thursday, July 15, 2010

सच का सामना

सच का सामना वही कर सकता है, जिसने सच को जाना और पहचाना है। सच को जानना और उसे पहचानना सरल भी नहीं है। वर्षों की साधना और तपश्या के बाद सच की एक झलक मिलती है।
सच वह नहीं है जिसे सभी सच समझते है। सच वो है जिसे कोई समझ नहीं सकता। हमारी शारीरिक और मानसिक छमता सिमित है। हमारा मस्तिस्क सच को जानने और समझने के योग्य नहीं है।
सच को जानने के लिए भौतिक जगत से बहार जाना होता है। इसके लिए लम्बी और अथक साधना की जरुरत पड़ती है। इन्सबो के बाद भी यह आवश्यक नहीं की सच से सामना हो ही जाये।
सच का उदभव हमेशा ही आपने अलग स्वरुप में ही होता है, जिसे केवल महशुस किया जा सकता है। जब सच का उदय मानव शारीर में होता है तो इसका सामना करना इतना आसान भी नहीं होता। सच के आगे कमजोर मानव पागल भी हो सकता है.

Monday, May 24, 2010

4

इस धरती पर बड़े बड़े विचारक पैदा लिए। सबों ने अपनी-अपनी सोच के अनुसार दुनिया के सामने विचार रखे। दुनिया ने उन विचारों पर फिर से सोचा और उसे सही या गलत बताया। विचारों पर सोच समझ कर आलोचनाएँ और समालोचनाए हुई। मगर हल कुछ भी नहीं निकला।


युग पुरुष महात्मा गाँधी के विचार, लेनिन और डार्विन के विचार, मार्क्स के सभी के विचार सम कालीन थे। समय के साथ सबों के विचार धुंधले पड़ते गए। कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी आज भी प्रासंगिक हैं। मगर आज ना कोई गाँधी के विचारों को मनने के लिए तैयार है और कुछ लोग तो उनके विचारों के सकत विरोधी भी हैं।

हर विचार के दो पहलू होते हैं। एक पछ तो दूसरा विपछ। पछ सकारात्मक होता है तो विपछ नकारात्मक। लेकिन दोनों पछों का महत्व हमेशा सामान ही होता है। दोनों एक हीं सिक्के के दो पहलू होते हैं। हमेशा साथ साथ चलते है।

कोई भी ऐसा विचार नहीं हो सकता जिसका कि सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू ना हो। जबतक दोनों पहलू विद्यमान है तब तक विचार कभी भी सत्य अथवा अथार्थ नहीं हो सकता। विचार को सत्य और अथार्थ होने के लिए, इन दोनों पहलुओं में से किसी भी का नहीं होना आवश्यक है।

Friday, May 21, 2010

3

ऐसा मना जाता है कि सवालों के जबाब सोचने से मिलते हैं। मगर ऐसा नहीं है। सोचने से नए सवाल खड़े होते हैं। मूल सवाल के जबाब नहीं मिलते।

अगर मूल सवालों के जबाब सोचने से मिले होते तो अबतक सारे सवालों के जबाब मिल जाने चाहिए थे।

रोज नीत नए सवाल खड़े हो रहे हैं और इन्सान उनसबों के जबाब खोजने में लगा है। ज्यादा सोचने वाला इन्सान ज्यादा चालक और चतुर हो सकता है, ज्यादा बुद्धिमान नहीं हो सकता।

जिनलोगों ने मूल सवालों के जबाब खोजे है, वे सोचने में विश्वास नहीं रखते थे। वे तो वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजते थे।

वगैर सोचे सवालों के जबाब खोजे जा सकते हैं, ऐसा आपने कभी सुना है ? अगर सुना है तो हमें भी बताएं। आपका स्वागत है।

2

हमारा जन्म, हमारा लालन-पालन, हमारी प्रार्थमिक शिक्छा, हमारे माता पिता, जीवन कि ये मुलभुत आधार स्तम्भ, हमारी इच्छाओं और हमारी सोच की वजह से हमें नहीं मिले। भौतिक जीवन में इन चीजों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।

क्या वजह है कि कोई गरीब घर में जनम लेता है और कोई शुखी संम्पन्न घर में ? क्या वजह है कि कोई जन्म के साथ ही करोरपति होता है और कोई दूध के लिए भी तरसता है ?जन्म के साथ हमें जो मिलता है जिसे हम विरासत या प्रारब्ध कहते है, वह एक सा क्यों नहीं होता ? इस धरती कि कुदरती चीजे सबों को एक सामान मिलती है, जैसे हवा, प्राणवायु, सूर्य की रोशनी, मिटटी, पानी इत्यादि। परन्तु भौतिक जीवन के ये आधार, हमसाबों को एक जैसे क्यों नहीं मिलते ?
क्या आपके पास इसका जबाब है ? अगर है तो अवश्य लिखे। आपका स्वागत है।

1

हम समझते हैं कि हमारी सोच और समझ हमारे आपने दिमाग कि उपज है। जबकि सच ऐसा नहीं है। हमारी सोच और समझ हमारे दिमाग कि नहीं हमारे पिछले कर्मों और अनुभवों का संचित डाटा और उसके बिशलेषण से उपजी आउट पुट का  एफ्फेक्ट मात्र है।
हमारी सोच परिस्थितियों और इच्छाओं के अनुसार बदलती रहती है। हमारी सोच हमारे पिछले कर्मो और अनुभवों के अनुसार अपना रूप और अपना आकर लेती रहती है। आज   हम जो कुछ भी हैं, आपने पिछले कर्मों के परिणाम मात्र हैं। एक कर्म कई नए कर्मो को जन्म देती है। यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है।
असल में हम सोचते नहीं, वल्कि हम सोचने को मजबूर होते है। पिछले कर्मों कि वजह से आगे जो नए कर्मों कि श्रंखला उत्पन्न होती है, हमारी सोच उसी का परिणाम है।
इसलिए सोचना बंद करें फिर देखें कि आगे क्या होता है ?